बुधवार, 21 जनवरी 2009

मां बेटे पर कविता क्यूं नहीं लिखती ?
अभी कल ही अजीत जी ने मेरी एक कविता के सन्दर्भ में यह प्रश्न किया था। मैने जवाब में लिखा :
शब्दकोष लगता रिता
लघु लगते अलंकार सभी
अपने से परे सन्तान
सोच ना पाई मां कभी
निज अंगों से रोष तोष
उपकार खोज ना पाती
खुद पर क्या भाव लुटाना
नही इसीलिये लिख पाती
लेकिन जब आज समाचार पत्र उठाया तो लीला सेठ की चन्द पंक्तियों पर नजर ठहर गई
खुले आम
परोसी जा रही है
सभी पी रहे है
जैसे किसी को
चाय पसन्द
वैसे मेरे बेटे को
शराब पसन्द

वाह मां वाह क्या कविता लिखी है
ना जाने कितने बच्चों और मांओं की प्रेरणा का स्रोत बनेगी ।
अपने व्यक्तिगत व्यवहार को सार्वजनिक रूप से करने पर जीवन मे पारदर्शिता बनी रहती है
शायद ऊंचा कद हो जाने से दिल और दिमाग के मध्य भी दूरी बढ जाती हो
वा छोडो .......... अपने क्या करना ( आपाने कई कन्नो)