गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
सोशियलिस्टिक बैंकिंग
vinay k joshi said...
बैठक में कुछ शब्द मेरे भी :
-बैंक ना तो जमाओ पर न ही ऋणों पर ब्याज दर निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है |
-देश में जितनी भी करेसी है सब भारतीय रिजर्व बैंक की है |
-रिजर्व बैंक पूर्णत: सरकारी व्यवस्था है , जिसके गवर्नर वित्त मंत्री होते है |
-प्रत्येक बैंक को मौदिक नीति, ऋण जमा अनुपात, सेवा शर्तो इत्यादि हेतु भा.रि.बै. के नीति निर्देशों की अनुपालना करना आवश्यक होता है |
-सभी बैंको को अपने पास रखे करेंसी नोटों के लिए भा.रि.बै. को ब्याज देना होता है |
-इसी तरह सभी बैंको की अपने पास रखी जमाओ पर भा.रि.बै. भी बैंको को ब्याज देता है |
-सूदखोरी आर्थिक दलाली या पैसे से पैसे उगाना आदि तो प्राइवेट मनी लेंडर करते है | जो जमाए नही लेते बल्कि अपनी जमा की रकम को उधर दे दो, तीन या चार रुपया सैकडा या सामने वाले की मज़बूरी अनुसार इससे भी अधिक वसूल करते है |
-बैंको द्वारा जमाओ व् ऋणों पर लगाया गया ब्याज वास्तव में सर्विस मार्जिन ही है |
जिसे कई बार भा.रि.बै. मुद्रा स्फीति / संकुचन नियंत्रित करने के लिए घटाती बढाती है |
-बैंक अनुत्पादक ऋणों ( वे ऋण जो देश के विकास में अधिक सहायक न हो ) पर ब्याज दर अधिक रखते है |
-जब अर्थ सम्मिलित होता है तो लाभ या हानि भी होती ही है | बैंको को प्राप्त ब्याज, जमाओ पर चुकाए गए ब्याज एवम परिचालन खर्चो के बाद बची राशि लाभ होती है |
यह लाभ केंद्रीय वित्त व्यवस्था का होता है, जिसे भा.रि.बै. को हस्तांतरित करना होता है
यानी बैंको का लाभ अंतत: आर्थिक विकास व्यवस्था का ही अंग होता है |
-भारत में विदेशी बैंको द्वारा कमाए गए लाभ को अपने देश ले जाने की स्वतंत्रता नही है |
-राष्ट्रीयकृत बैंक , प्राइवेट सेक्टर, पब्लिक सेक्टर बैंक, सहकारी बैंक, या विदेशी बैंक बिना भा.रि.बै. की अनुज्ञा के इस देश में संचालित नही हो सकते |
-भा.रि.बै. बड़े उद्योगों, लघु उद्योगों, नौकरीपेशा, व्यक्तिगत क्षेत्र, कमजोर तबको, अल्पसंख्यको, कृषि, हाऊसिंग, आदि को ऋण देने हेतु भा.रि.बै. के स्पष्ट निर्देश होते है एवम लक्ष्य निर्धारित करती है, जिसकी प्राप्ति सुनिश्चित करना प्रत्येक बैंक प्रबंधन का दायित्व होता है
-विदेशी बैंकिंग व्यवस्थ एवम भारतीय बैंकिंग व्यस्था बिल्कुल अलग है | वहा पूर्ण स्वायत्तता है | वे मनमाने लाभार्जन हेतु स्वतंत्र है | अधिक लालच में आधारभूत आर्थिक नियम भूल जाते है और फैल हो जाते है |
-सोशलिज्म एक पूर्ण व्यवस्था है जिसमे राजनैतिक, सामजिक एवम आर्थिक तीनो क्षेत्र आते है |
-केवल आर्थिक सोशलिज्म से देश की आर्थिक व्यवस्था छिन्नभिन्न हो जायेगी
-भीड़ की मानसिकता ही यह होती है, कि जो लाभान्वित होता है वह चुप रहता है और जो वंचित रहता है, व्यवस्था की आलोचना करता है | सो लोगो की चुप्पी पर दो लोगो के वक्तव्य भरी पड़ते है |
-बुराई हर जगह होती है लेकिन याद रहे यह फिर भी अच्छाई से कम ही होती है |
-पहले यह तय करना होगा कि हम सम्पूर्ण व्यवस्था ही बदलना चाहते है या व्यवस्था क्रियान्वयन पद्दति |
-सोशियल बैंकिग व्यवस्था में बदलाव है, व्यवस्था पद्दति में नही |
सबसे बड़ी जिम्मेदारी हम पर है हमें यह तय करना है कि हम part of the problum बनाना चाहते है या part of the solution |
बैठक में कुछ शब्द मेरे भी :
-बैंक ना तो जमाओ पर न ही ऋणों पर ब्याज दर निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है |
-देश में जितनी भी करेसी है सब भारतीय रिजर्व बैंक की है |
-रिजर्व बैंक पूर्णत: सरकारी व्यवस्था है , जिसके गवर्नर वित्त मंत्री होते है |
-प्रत्येक बैंक को मौदिक नीति, ऋण जमा अनुपात, सेवा शर्तो इत्यादि हेतु भा.रि.बै. के नीति निर्देशों की अनुपालना करना आवश्यक होता है |
-सभी बैंको को अपने पास रखे करेंसी नोटों के लिए भा.रि.बै. को ब्याज देना होता है |
-इसी तरह सभी बैंको की अपने पास रखी जमाओ पर भा.रि.बै. भी बैंको को ब्याज देता है |
-सूदखोरी आर्थिक दलाली या पैसे से पैसे उगाना आदि तो प्राइवेट मनी लेंडर करते है | जो जमाए नही लेते बल्कि अपनी जमा की रकम को उधर दे दो, तीन या चार रुपया सैकडा या सामने वाले की मज़बूरी अनुसार इससे भी अधिक वसूल करते है |
-बैंको द्वारा जमाओ व् ऋणों पर लगाया गया ब्याज वास्तव में सर्विस मार्जिन ही है |
जिसे कई बार भा.रि.बै. मुद्रा स्फीति / संकुचन नियंत्रित करने के लिए घटाती बढाती है |
-बैंक अनुत्पादक ऋणों ( वे ऋण जो देश के विकास में अधिक सहायक न हो ) पर ब्याज दर अधिक रखते है |
-जब अर्थ सम्मिलित होता है तो लाभ या हानि भी होती ही है | बैंको को प्राप्त ब्याज, जमाओ पर चुकाए गए ब्याज एवम परिचालन खर्चो के बाद बची राशि लाभ होती है |
यह लाभ केंद्रीय वित्त व्यवस्था का होता है, जिसे भा.रि.बै. को हस्तांतरित करना होता है
यानी बैंको का लाभ अंतत: आर्थिक विकास व्यवस्था का ही अंग होता है |
-भारत में विदेशी बैंको द्वारा कमाए गए लाभ को अपने देश ले जाने की स्वतंत्रता नही है |
-राष्ट्रीयकृत बैंक , प्राइवेट सेक्टर, पब्लिक सेक्टर बैंक, सहकारी बैंक, या विदेशी बैंक बिना भा.रि.बै. की अनुज्ञा के इस देश में संचालित नही हो सकते |
-भा.रि.बै. बड़े उद्योगों, लघु उद्योगों, नौकरीपेशा, व्यक्तिगत क्षेत्र, कमजोर तबको, अल्पसंख्यको, कृषि, हाऊसिंग, आदि को ऋण देने हेतु भा.रि.बै. के स्पष्ट निर्देश होते है एवम लक्ष्य निर्धारित करती है, जिसकी प्राप्ति सुनिश्चित करना प्रत्येक बैंक प्रबंधन का दायित्व होता है
-विदेशी बैंकिंग व्यवस्थ एवम भारतीय बैंकिंग व्यस्था बिल्कुल अलग है | वहा पूर्ण स्वायत्तता है | वे मनमाने लाभार्जन हेतु स्वतंत्र है | अधिक लालच में आधारभूत आर्थिक नियम भूल जाते है और फैल हो जाते है |
-सोशलिज्म एक पूर्ण व्यवस्था है जिसमे राजनैतिक, सामजिक एवम आर्थिक तीनो क्षेत्र आते है |
-केवल आर्थिक सोशलिज्म से देश की आर्थिक व्यवस्था छिन्नभिन्न हो जायेगी
-भीड़ की मानसिकता ही यह होती है, कि जो लाभान्वित होता है वह चुप रहता है और जो वंचित रहता है, व्यवस्था की आलोचना करता है | सो लोगो की चुप्पी पर दो लोगो के वक्तव्य भरी पड़ते है |
-बुराई हर जगह होती है लेकिन याद रहे यह फिर भी अच्छाई से कम ही होती है |
-पहले यह तय करना होगा कि हम सम्पूर्ण व्यवस्था ही बदलना चाहते है या व्यवस्था क्रियान्वयन पद्दति |
-सोशियल बैंकिग व्यवस्था में बदलाव है, व्यवस्था पद्दति में नही |
सबसे बड़ी जिम्मेदारी हम पर है हमें यह तय करना है कि हम part of the problum बनाना चाहते है या part of the solution |
बुधवार, 21 जनवरी 2009
मां बेटे पर कविता क्यूं नहीं लिखती ?
अभी कल ही अजीत जी ने मेरी एक कविता के सन्दर्भ में यह प्रश्न किया था। मैने जवाब में लिखा :
शब्दकोष लगता रिता
लघु लगते अलंकार सभी
अपने से परे सन्तान
सोच ना पाई मां कभी
निज अंगों से रोष तोष
उपकार खोज ना पाती
खुद पर क्या भाव लुटाना
नही इसीलिये लिख पाती
लेकिन जब आज समाचार पत्र उठाया तो लीला सेठ की चन्द पंक्तियों पर नजर ठहर गई
खुले आम
परोसी जा रही है
सभी पी रहे है
जैसे किसी को
चाय पसन्द
वैसे मेरे बेटे को
शराब पसन्द
वाह मां वाह क्या कविता लिखी है
ना जाने कितने बच्चों और मांओं की प्रेरणा का स्रोत बनेगी ।
अपने व्यक्तिगत व्यवहार को सार्वजनिक रूप से करने पर जीवन मे पारदर्शिता बनी रहती है
शायद ऊंचा कद हो जाने से दिल और दिमाग के मध्य भी दूरी बढ जाती हो
वा छोडो .......... अपने क्या करना ( आपाने कई कन्नो)
अभी कल ही अजीत जी ने मेरी एक कविता के सन्दर्भ में यह प्रश्न किया था। मैने जवाब में लिखा :
शब्दकोष लगता रिता
लघु लगते अलंकार सभी
अपने से परे सन्तान
सोच ना पाई मां कभी
निज अंगों से रोष तोष
उपकार खोज ना पाती
खुद पर क्या भाव लुटाना
नही इसीलिये लिख पाती
लेकिन जब आज समाचार पत्र उठाया तो लीला सेठ की चन्द पंक्तियों पर नजर ठहर गई
खुले आम
परोसी जा रही है
सभी पी रहे है
जैसे किसी को
चाय पसन्द
वैसे मेरे बेटे को
शराब पसन्द
वाह मां वाह क्या कविता लिखी है
ना जाने कितने बच्चों और मांओं की प्रेरणा का स्रोत बनेगी ।
अपने व्यक्तिगत व्यवहार को सार्वजनिक रूप से करने पर जीवन मे पारदर्शिता बनी रहती है
शायद ऊंचा कद हो जाने से दिल और दिमाग के मध्य भी दूरी बढ जाती हो
वा छोडो .......... अपने क्या करना ( आपाने कई कन्नो)
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